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“नाद” = आंतरिक कंपन              प्राकृतिक जीवन शक्ति                            शरीर, श्वास और प्रकृति के बीच सामंजस्य का प्रतीक।

 

आयुर्वेद में शरीर में रोग के कारण और निवारण को जितनी स्पष्टता से वर्णित किया है वो किसी अन्य चिकित्सा पद्धति में दिखाई नहीं देता । आयुर्वेद के अनुसार "सर्वाणाम रोगाणाम कारणम कुपित मलं " अर्थात शरीर में उत्पन्न समस्त रोग का कारण कुपित मल है तो निदान शरीर से मल का निष्कासन (शुद्धि) है इस हेतु विभिन्न औषधियों का वर्णन आयुर्वेद में पाया जाता है जिनमें से कुछ प्रमुख औषधियों(मुख्य द्रव्य हरड़ जिसको अभया भी कहा गया है जिसका सेवन रोग एवं मृत्यु से अभय प्रदान करता है) का चुनाव करके एक योग का निर्माण (consti o fine)हमारे संस्थान ने किया है जो शुद्धि के कार्य को बिना कष्ट के क्रियान्वित करके सभी रोगों के मूलभूत कारण के निवारण का कार्य करती है जिसके लगातार सेवन से शरीर में वात पित्त कफ का संतुलन स्थापित होकर अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है इसकी आदत भी नहीं लगती है और अन्य तीव्र विरेचन(lexcativ) से होने वाली हानि भी नहीं होती है, यह स्वास्थ्य को निरंतर धीरे धीरे उत्तम से अति उत्तम की और ले जाती है जिससे लगभग सभी रोगों को जड़ से निदान करने में विशेष सहायता प्राप्त होती है l परंपरा से कहा भी जाता है सभी रोगों की जड़ पेट में होती है और उनका निदान भी पेट से होकर जाता है ।

 

श्वास , शरीर में जीवन का आधार हैं श्वास नहीं तो जीवन नहीं श्वास रूपी डोरी के टूटने से शरीर और आत्मा अलग हो जाते हैं जिसको मृत्यु कहा गया है श्वास को बलवान और संतुलित करने से मन मस्तिष्क और जीवन संतुलित होकर जीवन में परमानन्द की प्राप्ति कराता है संतुलित श्वास सुखी आनंदित, संतुलित जीवन का आधार है जिसको हम फेफड़ों के द्वारा प्राप्त करते हैं परन्तु कफ से भरे फेफड़े मनुष्य को सुखी जीवन जीने में बाधा है कफ में संक्रमण से फेफड़ों में सूजन (निमोनिया दमा आदि) द्वारा श्वास लेने में अत्यंत कठिनाई होती है शरीर को प्राणवायु (ऑक्सीजन) पूरी नहीं प्राप्त होती है शरीर कोई श्रम साध्य कार्य नहीं कर पाता है सांस फूली रहती है स्थिति अत्यंत कष्टप्रद हो जाती है रोगी को किसी प्रकार आराम नहीं मिलता है तब संचित कफ को बाहर निकालना (शुद्धि) ही एकमात्र निदान है आयुर्वेद में कहा गया है "सर्वाणाम रोगानाम कारणम कुपित मल" अर्थात शरीर में उत्पन्न सभी रोगों का एकमात्र कारण कुपित मल है और निदान ,मल का निष्कासन है जो फेफड़ों से भी और आंतों से भी करना आवश्यक है ।


शरीर जब मल वृद्धि की अनुभूति कर लेता है तो विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाओं द्वारा उसको बाहर फेंकने का प्रयास करता है जैसे उल्टी, दस्त, जुखाम खांसी आदि जिनको आयुर्वेद में मित्र रोग कहा जाता है जो हमारे स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए आते हैं अगर इन रोगों को रोकने के स्थान पर ऐसी औषधियों का सेवन कराया जाए जो सुगम निष्कासन में सहायक हों तो शरीर जल्द ही स्वस्थ हो जाता है । फेफड़ों से कफ के निष्कासन, और कफ के ज्यादा निर्माण पर नियंत्रण के लिए हमारे संस्थान ने विभिन्न आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों से एक योग (kaf o fine)का निर्माण किया है । इसमें प्रयुक्त समस्त जड़ी बूटियों का प्रयोग श्वसन संस्थान को स्वच्छ ,बलवान संतुलित एवं स्वस्थ बनाए रखने में किया जाता है । इस योग का प्रयोग खांसी, जुखाम , दमा,साइनसाइटिस, निमोनिया वायरल बुखार, नजला आदि श्वसन तंत्र की समस्त बीमारियों में कष्टों को कम करने हेतु अत्यंत सहायक है ।

 

 

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